हिंदी कहानियां छोटे बच्चों के लिए - hindi mein bachchon ki kahaniyan
प्रेरणादायक हिंदी कहानी संग्रह, हिंदी कहानियां छोटे बच्चों के लिए,
हिंदी कहानी बुक, हिंदी कहानी बच्चों की नई हिंदी कहानियां, हिंदी कहानी
बच्चों की, हिंदी कहानी संग्रह, हिंदी कहानी बच्चों के लिए स्टोरी, मजेदार
कहानियां हिंदी कार्टून, बच्चों की मजेदार हिंदी कहानियां, शार्ट स्टोरी
फॉर चिल्ड्रन इन हिंदी, स्टोरी फॉर चिल्ड्रेन इन हिंदी, हिंदी स्टोरी फॉर
चिल्ड्रन विथ मोरल, हिंदी स्टोरी फॉर किड्स, बच्चों के लिए हिंदी कहानियां,
बच्चों की कहानियां हिंदी में, hindi kahaniyan full episode, hindi
kahaniya baccho ke liye, hindi kahaniya baccho ki, hindi kahani for
kids, hindi kahani books, hindi me kahani kaise likhe, hindi mein
bachchon ki kahaniyan.
मेरे लिए मीनल को संभालना बहुत मुश्किल हो रहा था , तीन चार दिन हो गए थे ठीक से कुछ खा नहीं रही थी ,बस रोती रहती थी। अपने घर से दूर होस्टल में हम दोनों सहेलियां एक दूसरे की जिम्मेदारी थी। और एक दो दिन इसका बरताव ऐसा ही रहा तो मजबूरन मुझे इसके घर फोन करना पड़ेगा जो मैं करना नहीं चाहतीं थीं।
हम दोनों को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर वापिस जाना पड़ेगा। मैं उसको यही समझाने की कोशिश कर रही थी कि छोड़ जो हुआ, भूल जा ,अपने आप पर नियंत्रण रख और रोना-धोना बंद कर दें, लेकिन वह सुन नहीं रही थी । आखिर बार कोशिश करने के उद्देश्य से मैंने उसको झकझोरते हुए कहा" देख तुझे पहले से ही पता था वह कैसा लड़का है , फिर भी तूने उसके साथ दोस्ती की ।वह किसी भी लड़की के साथ लम्बे समय तक रिलेशनशिप में नहीं रहता है फिर तूने कैसे सोच लिया वह तेरे साथ सीरियस हो जाएगा।अब उसके लिएे रोने से क्या फायदा एक कटु अनुभव समझ कर आगे बढ़,जीवन में पता नहीं और क्या क्या देखने को मिलेगा।"
मीनल :" तू समझ नहीं रही है मैं उसे दिल से चाहने लगीं थीं। मेरे प्यार का इतना मान तो रखता कम से कम ब्रेकअप से पहले आकर इतना तो बताता क्यों मुझे एवाइड कर रहा है।बस एकदम से मिलना बंद कर दिया , फोन मिलाओ तो काट देता है और स्वयं मिलाता नहीं। पहले रोज मिलने आता था , व्यस्त होता था तो फोन करता था , लेकिन दस पंद्रह दिन से बिल्कुल अनदेखा कर रहा है। "
और मीनल ने फिर सुबकना शुरू कर दिया। अनिकेत को पता नही एकदम से ऐसा क्या हो गया मीनल से बिल्कुल संपर्क खत्म कर दिया , बिना किसी कारण के।एक हफ्ते तक मीनल सोचती रही शायद व्यस्त हैं लेकिन चार दिन पहले उसने अनिकेत को किसी लड़की के साथ देखा बस तब से उसने अपना यह हाल बना रखा था।
मैं :" अब अगर तूने अपने आप को नहीं संभाला तो मैं तेरे घर फोन करने वाली हूं कल को तूझे कुछ हो गया तो मेरी आफत आ जाएगी सोच ले तैयार हो जा ,हम दोनों बाहर चलते हैं , कुछ खाकर माल में घूम कर आएंगे। तुझे अच्छा लगेगा , नहीं तो मैं काकी को फोन कर रही हूं।"
मीनल आंखें पोंछ कर , "ठीक है चल मैं तैयार होकर आती हूं ।"
बेवकुफ ने सुबह से स्नान तक नहीं किया था , कपड़े लेकर वह बाथरूम में चली गई।
मीनल अनिकेत से चार महीने पहले ही मिली थी ,वह एमबीए फाइनल का छात्र था । मैं और मीनल अंग्रेजी में स्नातक के आखिरी वर्ष के छात्र थे । दोनों बिल्कुल अलग विभाग के थे, अलग-अलग इमारतों में कक्षा लगती थी, इसलिए हम कभी उससे मिले नहीं थे।इस बार युनिवर्सिटी ने भव्य रुप में दिपावली मनाने का कार्यक्रम रखा,सब विभागों को मिलजुल कर यह आयोजन करना था।
अनिकेत और उसके दोस्त दिवाली मेले का बंदोबस्त देख रहे थे और आखिरी वक्त पर मैंने दीये बेचने का स्टोल लगाने का मन बनाया।
बड़ी मिन्नतें करनी पड़ी अनिकेत की तब उसने एक छोटे-से स्टोल का इंतजाम किया किसी तरह , लेकिन उसे सजाने में बहुत मदद की। तीन दिन जब तक मेला रहा वह हमारे पास किसी न किसी बहाने से आता रहा।उसका यह व्यवहार हम दोनों की समझ से बाहर था,
वह केंपस का सबसे मशहूर लड़का था आकर्षक व्यक्तित्व और आत्मविश्वास से लबालब । वह और उसके दोस्त यश का नाम सुर्खियों में रहता था, कभी किसी प्रतियोगिता में अव्वल आने के लिए तो कभी किसी लड़की से फ्लर्ट या ब्रेकअप के लिए। होस्टल में रहने के कारण हमें यह सब सुनने को मिलता रहता था चुंकि होस्टल कामन था, एमबीए की बहुत सी लड़कियां थी।
अनिकेत के उपस्थिति के कारण हमारी बिक्री अच्छी हुई वरना हमें कौन पूछता। हमें तो कोई पलटकर भी देख लें तो हम पर एहसान करता था।
हम दोनों ही एक ऐसे छोटे से कस्बे से आईं थीं जहां पढ़ाई-लिखाई का विशेष महत्व नहीं था। लड़के गुंडा गर्दी में रहते और लड़कियों को पढ़ाने में कोई विश्वास नहीं करता था। मेरे परिवार में भाई दसवीं बारहवीं किसी तरह पढ़कर काम पर लग जाते, कईं कपड़ा मीले थी बस जो लड़का बड़ा होता वही काम करने लग जाता। मीनल के यहां खेत खलिहान थे गोदाम थे ,बस सारा खानदान इसी काम में लगे रहते।पान चबाते , मुंह में थूक की तरह गालियां भरे ,सब जगह अपनी धौंस जमाते फिरते।
मैं और मीनल अक्सर साथ रहते , उसके घर में बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थी और मैं अपने परिवार में इकलौती लड़की थी। हमें बाहर अकेले कहीं भी आने-जाने की इजाज़त नहीं थी। बारहवीं में हम दोनों के बहुत अच्छे अंक प्राप्त हुए , आजतक किसी के नहीं आए थे ।बस सब जगह वाह वाह होने लगी और पिताजी पर दबाव पड़ने लगा लड़की को और आगे पढ़ाया जाना चाहिए। यही हाल मीनल के घर का भी था। पिताजी का मन तो नहीं था लेकिन कुछ भावना में बह गए और कुछ समाज के संभ्रांत लोगों का दबाव ऐसा पड़ा की सबसे करीब शहर के कालेज में दोनों का दाखिला करवा दिया गया और रहने की व्यवस्था होस्टल में। लेकिन एक तलवार दोनों के सिर पर लटकी रहती कि कुछ भी उल्टी सीधी बात सुन ली दोनों के बारे में तो तुरंत वापस आना पड़ेगा।
एक साल तक हम दोनों भींगी बिल्ली बन कर रहे। मेरे दिमाग में एक उधेड़बुन सी रहती,अब तक औरतों का जीवन चुल्हे चौके तक सीमित मान कर चलती थी। कुछ फिल्मों में उनका दूसरा रूप देखकर सोचती यह सब काल्पनिक है या कुछ किस्तम वाली औरतें होंगी। लेकिन यहां होस्टल और कालेज में लड़कियां बिंदास कुछ भी पहनकर घूमती , बिना रोक-टोक जोर से हंसती बोलती तो बड़ा आश्चर्य होता। मुझे उससे अधिक प्रभावित उनकी सोच ने किया, सब के अलग-अलग सपने और उनके लिए कुछ भी कर गुजरने का जज्बा। मेरे भी अरमान कुलांचे भरने लगे,लगा मुझे भी अपने जीवन को कुछ अलग शक्ल देनी चाहिए।मीनल और मेरे बारहवीं में अंग्रेजी में सबसे अधिक अंक आए तो हमें लगा आगे अंग्रेजी ही पढ़नी चाहिए। लेकिन यहां आकर पता चला हमारी अंग्रेजी कितनी गई गुजरी थी , पता नहीं अंक कैसे आ गए | हमारा उच्चारण ,शब्द ज्ञान और व्याकरण सब निम्न स्तर के थे ।हम दोनों ने एक साल जमकर इस भाषा पर मेहनत की रात दिन एक कर दिये। अब हम दोनों के रहन-सहन , बोल चाल और विचारों में बहुत अंतर आ गया था,बहनजी से कूल बन गई थी। लेकिन लड़कों से बात करने में अभी भी फूंक सरकती थी |
मीनल और मैं जब भी समय मिलता ,शाम को हम अक्सर खाली होते बाहर निकल जाते।हम शहर का कोना कोना देखना चाहते थे, ऐसे ही घुमते हुए हम दोनों हस्तशिल्प की एक दुकान पर पहुंचे। वहां बहुत ही कलात्मक सुंदर और सादगी से भरी हाथ की बनी वस्तुएं रखी थी। मैं स्वयं इस तरह की वस्तुएं बनाकर बहुत आनंदित महसूस करतीं थीं ।उस दुकान की मालकिन प्रभादेवी ने मुझे बताया कैसे वह इस दुकान के माध्यम से गरीब लड़कियों की मदद करतीं हैं। पहले उन्हें सामान देकर काम सिखाती , बाद में जब लाभ होता वह उन्हें पैसे देकर उनकी आर्थिक मदद भी करती।वे बिल्कुल अकेली थी तो यह दुकान ही उनका जीवन थी।
लेकिन वे इस बात से दुखी थी की कोई इन वस्तुओं को अधिक खरीदना पसंद नहीं करता। मेरी दिलचस्पी देखकर वे बोलीं ," तुम जब चाहो यहां आकर सहायता कर सकती हो , रचनात्मक गतिविधियों में सम्मिलित होकर अपने अंदर की प्रतिभा को विकसित कर सकती हो।"
मैं अब जब भी फुर्सत मिलती वहां चली जाती, दुकान पर खड़े होकर लोगों को समान बेचना , बच्चों और महिलाओं के साथ बैठ कर हाथों से कुछ कलात्मक बनाना मुझे बहुत संतुष्टि देता। इन्हीं वस्तुओं को बेचने के लिएमुझे और मीनल को इस दिवाली मेले में अनिकेत से भाग लेने के लिए बहुत अनुरोध करना पड़ा था क्योंकि हमारे दिमाग में भाग लेने की बात बहुत देर से आईं। यह कालेज में हमारा आखिरी साल था इसलिए हम बहुत कुछ अनुभव कर लेना चाहती थी, फिर तो पता नहीं हमारे भाग्य में क्या लिखा है।
दिवाली की छुट्टियों में हम दोनों अपने घर चली गई। जब वापस आएं तो मैं यथावत हस्तशिल्प की दुकान जाने लगी शाम को और अनिकेत ने मीनल को काफी के लिए आमंत्रित किया।मीनल बहुत खुश हुई और वे अक्सर मिलने लगे, संध्या साथ बिताने लगे। मैं ने एक दो बार मना किया अनिकेत जैसे बदनाम लड़के से मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं। मीनल कहां मानने वाली थी, फिर कईं बार अनिकेत अपने दोस्त यश और मुझे भी साथ ले जाता लंच या डिनर , फिल्म या घूमने के लिए। मुझे इन दोनों दोस्तों के व्यवहार में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा और हम जब भी कहीं जाते चारों बहुत मस्ती करके आते। उन दोनों ने एक फ्लेट किराये पर ले रखा था
अपनी-अपनी गाडियां थी बहुत ठाठ-बाट से रहते थे। लगता था ,क्या सुना भी था बहुत पैसे वाले घर से हैं।यश की पता नहीं कोई स्थाई गर्लफ्रेंड थी की नहीं, हम जब भी साथ जाते वह किसी लड़की को साथ नहीं लाता था।
इस बार नये साल की पार्टी अनिकेत ने अपने फ्लेट पर रखीं थीं। हम दोनों को भी आमंत्रण मिला था , कुछ जुगाड करके वार्डन से इजाजत ली और पहुंच गए नए साल का जश्न मनाने। छत पर डीजे लगाकर संगीत का इंतजाम था , बहुत सारे लड़के लड़कियां आमंत्रित थे। तारों से भरा आसमान , ठंडी-ठंडी हवा और कर्णप्रिय संगीत सब मस्त हो रहे थे। अनिकेत और मीनल एक दूसरे में इतना खोए हुए थे उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं था,अधिकतर जो कपल्स थे उनका यही हाल था
जो अकेले थे वे भी अपनी धुन में नाच रहे थे। बीच-बीच में यश आता कुछ देर मेरे साथ नाचता फिर चला जाता । बहुत देर हो गई थी मुझे प्यास लगी थी कुछ खाने का मन भी कर रहा था खाने पीने का इंतजाम फ्लेट में था इसलिए मैं नीचे आ गई। यहां भी लड़के लड़कियां बिखरे पड़े थे , सोने का भी इंतजाम था इसलिए गद्दे भी पड़े थे। मैं ने प्लेट में मनपसंद चींजे डाली , एक कोक ली और बालकनी की ओर चल दी। बालकनी में यश हाथ में गिलास लिए अकेला खड़ा दूर शुन्य में न जाने क्या देख रहा था। मुझे पहले भी कई बार लगा था कि जैसे यश सबके मध्य होते हुए भी नहीं होता था ,न जाने कहां खोया हुआ होता था। जैसे ही मैं बालकनी में पहुंचीं वह पलटा ,एक पल को मुझे लगा उसकी आंखों में दर्द और अकेलापन था लेकिन तुरंत उसने मुस्कुराहट का मुखौटा ओढ़ लिया।
यश :" कुछ चाहिए क्या? "
मैं :" नहीं ,भूख लगी थी प्लेट लगा ली , तुम ने कुछ खाया या बस पीते रहने का इरादा है।"
यश :" जब सब खाएंगे तब कुछ ले लूंगा ।"
मैंने अपनी प्लेट आगे की तो उसने एक दो गस्सा खां लिया तभी एक पतली लम्बी सी लड़की आई और यश को खींचते हुए बोली :" चलो न यश बेबी डांस करने चलतें हैं "
वह उसके साथ चुपचाप चला गया। उसके बाद मेरा वहां मन नहीं लगा, कितनी भी भीड़ जमा कर लो मन का सूनापन कोई नहीं भर सकता ।बारह बजे सबने एक दूसरे को नये साल की शुभकामनाएं दी और फिर मैं एक कोने में गद्दे पर जाकर लेट गई।
एक दिन मैं हस्तशिल्प की दुकान पर अकेली बैठी कुछ मग पर चित्रकारी कर रही थी और प्यारे से संदेश लिख रही थी। किसी के आने की आहट पर मैंने आंखें उठा कर देखा तो यश खड़ा था । वह आश्चर्य से बोला :" तुम यहां क्या कर रही हो ?"
मैं :" कुछ नहीं तुम बताओ क्या चाहिए।?"
यश :" मेरी माम का जन्मदिन आने वाला है तो सोचा कोई तोहफा खरीद लेता हूं।"
मैं :" यहां यह सुगंधित मोमबत्ती आजकल बहुत पसंद की जा रही हैं ,मन को बहुत शांति देती है। फिर तुम कुछ मग भी दे सकते हो अपने आप कुछ लिख कर , उन्हें अपनेपन का अहसास होगा।"
यश ने बहुत सारी मोमबत्ती और कुछ मग लिए जिन पर उसने अपने हाथों से कुछ न कुछ लिखा।
उसे बहुत आनंद आया , लेकिन पौने आठ बज गए थे । आठ बजे के बाद होस्टल में घुसना मुश्किल हो जाएगा इसलिए मैंने उसे जल्दी करने को कहा। उसने मुझे अपनी गाड़ी में छोड़ा और अब अक्सर साढ़े सात बजे के करीब दुकान पर आ जाता मुझे समय से होस्टल छोड़ देता।
मुझे बहुत आराम हो गया था , इतनी ठंड में कभी रिक्शा मिलता था कभी नहीं , ज्यादा अंधेरा हो जाता था तो डर भी लगता था। इन दिनों मुझे उसकी आंखों में अपने लिए कुछ अलग भाव नजर आने लगे थे, लेकिन हम आपस में बहुत कम बोलते थे , खामोशी ही हमारी भाषा थी।
चौदह फरवरी को केंपस में उत्साह का ऐसा माहोल था कि सब पागल से हो रहे थे मीनल को अनिकेत ने गुलदस्ता, चाकलेट टेडीबियर और न जाने क्या क्या दिया।
मुझे तो एक दो ने जैसे कुछ रहम कर के कुछ फूल पकड़ा दिए वो भी मैं ने इधर उधर कर दिए। मुझे इस तरह की हरकतें बेवकुफी लगती थी। मीनल इतनी खुश थी कि पैर जमीन पर नहीं टिक रहें थे , लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि अगले दिन से अनिकेत ने उसे नजरअंदाज करना शुरू कर दिया।आठ दस दिन तो मीनल ने सोचा कुछ व्यस्त होगा , उसके फ्लेट में भी गई लेकिन या तो ताला लगा होता या कोई अंदर होता तो कह देता अनिकेत नहीं है। फोन भी नहीं उठा रहा था फिर एक दिन मीनल ने उसे मिस वेलेंटाइन के साथ देखा,बस उसी दिन से उसके रोने धोने का कार्यक्रम चल रहा था।
आधे घंटे बाद वह तैयार होकर आईं और हम होस्टल से बाहर निकल आए। सामने से यश आता दिखाई दिया , हमारे सामने आकर खड़ा हो गया, नजरें नहीं मिला रहा था। मीनल से बोला :" वो अनिकेत का पेनड्राइव दे दो" साफ दिख रहा था वह यहां बिल्कुल नहीं आना चाहता था , किसी अंधे कुएं में बैठना शायद उसके लिए बेहतर विकल्प होता। मीनल वापस चली गई अपने कमरे से अनिकेत का पेनड्राइव लाने और मैं ने यश को घूरना शुरू कर दिया। वह बहुत असहज महसूस कर रहा था ,हिले जा रहा था , इधर उधर देख रहा था। आखिर नहीं रहा गया तो बोला :" तू मुझे क्यो घूर रही हैं , मेरी क्या गलती है।"
मैंने अपने हाथ कमर पर रखकर लड़ने वाली मुद्रा बना ली और बोली :" तू एक कायर का दोस्त है बोल उस कुत्ते को आकर साफ साफ बताएं बात क्या है , ऐसे छिपने की क्या आवश्यकता है।"
और मैं गुस्से से उसे ऐसे ही देखती रही। उसने कंधे झटक दिया जैसे कह रहा हो घूर ले जितना घूरना है मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मीनल पेनड्राइव के साथ टेडीबियर और अनिकेत ने एक बड़ी महंगी ब्रांडेड घड़ी दी थी उसके जन्मदिन पर वह भी वापिस कर दी।
मीनल :" फूल मुरझा गए थे और चाकलेट मैं ने खा ली थी नहीं तो वे भी लौटा देती।" और हम दोनों अपने रास्ते चले गए।
अगले दिन पौने आठ बजे जब मैं हस्तशिल्प की दुकान से निकली तो यश बाहर गाड़ी में बैठा था। मैं उसे अनदेखा कर रिक्शे में बैठकर आगे बढ़ गई। वह गाड़ी धीरे धीरे चलाता मेरे पीछे होस्टल के गेट तक आया फिर चला गया। ऐसा कईं दिन तक चला ।एक दिन मौसम बहुत खराब हो गया , आंधी आ रहीं थीं , कोई रिक्शा नज़र नहीं आ रहा था स्ट्रीट लईट बंद थी घना अंधेरा था। मुझे कुछ घबराहट सी महसूस हुई तभी यश की गाड़ी मेरे एकदम पास आकर रुकी।
उसने बैठें बैठें ही मेरे लिए दरवाजा खोला और मैं चुपचाप बैठ गई ,इस समय अकड़ दिखाना भारी पड़ सकता था। कुछ देर हम खामोश बैठे रहे फिर यश बोला :" वे दोनों बच्चे नहीं हैं ,यह उनका व्यक्तिगत मामला है । उनके कारण हमारी दोस्ती पर क्यों आंच आ रही हैं। "
मैं :" शायद तुम ठीक कह रहे हो।"
इस बार प्रभा देवी ने होली के लिए आर्गेनिक रंग और गुलाल बनवाएं , वे चाहती थी कि इस बार किसी बड़े बाजार में इनकी बिक्री की जाएं। केंपस से थोड़ी दूरी पर शहर का सबसे बड़ा बाजार था वहां उन्होंने तीन दिन के लिए जगह किराये पर ली। पहले दिन तो मैं अधिक समय नहीं दे पाईं लेकिन अगले दिन मैं सुबह से ही पहुंच गईं। बहुत चहलकदमी और भीड़ थी बाजार में ,हमारा सामना भी खरीद रहे थे लोग । मुझे बहुत आनन्द और संतुष्टि मिल रही थी यह सब करके , मुझे लगा मेरे दिमाग में एक खाका सा तैयार हो रहा था कि भविष्य में मैं अपना जीवन किस तरह बिताना चाहती हूं। मैं आगे और पढ़ाई करके कोई नौकरी करूंगी , आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए, और कोई समाजसेवी संगठन या रचनात्मक कार्यशाला का हिस्सा बनुंगी मानसिक संतुष्टि के लिए। कहने को मार्च का महीना था अभी से गर्मी लगने लगी थी ,भीड़ भी बहुत थी इसलिए दमघुट रहा था। मैं अब स्कर्ट और शोर्ट्स में सहज महसूस करने लगी थी इसलिए शोर्ट्स पहन कर आई थी। जब गर्मी अधिक लगने लगी तो ऊपर पहनी हुई शर्ट उतार दी , उसके नीचे मैंने होल्टर नेक का टॉप पहना हुआ था । सात बजने वाले थे मैं ने सामान समेटना शुरू कर दिया ।इतनी कमाई देख प्रभा दीदी खुशी से झूम उठेंगी । कुछ हासिल करने का अहसास मुझे भी प्रसन्नता और संतुष्टि दे रहा था। तभी सामने से मां और चाचा को आते देखा, तो खुशी दुगनी हो गई की उनसे अपनी सफलता शेयर करुंगी। लेकिन मां का चेहरा मुझे देखते ही गुस्से से तमतमा गया , उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और खींचते हुए गाड़ी के पास ले गईं और धकेल कर उसमें बैठा दिया।
मां :" तेरा दिमाग खराब हो गया है , आधे अधूरे कपड़ों में बीच बाजार में सामान बेच रही है ,शर्म हया बेच खाई है।शरीर की नुमाइश कर रही है । तेरे पिताजी ने देख लिया होता तो एक मिनट यहां नहीं रुकने देते तुझे अब।"
मैं :" मां मेरी बात सुनो ,इन कपड़ों में कोई खराबी नहीं है। सब लड़कियां ऐसे ही कपड़े पहनती हैं। मां मैंने निश्चय कर लिया है मैं आगे क्या करूंगी , मेरे सपने क्या है...."
मां :" मुझे कुछ नहीं सुनना है तेरे पिताजी ने तेरा रिश्ता पक्का कर दिया , छगनलालजी के पोते गिरधारी से ।"
मैं :" नहीं मां मैं यह शादी नहीं करना चाहती हूं , मैं आगे पढ़ना चाहती हूं , अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं।"
मां ने एक जोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर मारा ।
मां :" दो चार महीने की पढ़ाई रह गई है नहीं तो अभी कान खींचते हुए तुझे घर ले जाती ।एक बात सुन ले जब वापस आएंगी तो यहां की बेशर्मी यहीं छोड़ कर आना । अजनबियों से हंसी ठिठोली और यह नंगापन वहां नहीं चलेगा।"
मुझे विश्वास नहीं हुआ कि मेरी मां मेरी बात ही सुनने को तैयार नहीं है वह मुझे मेरा भविष्य बनाने में क्या सहयोग देंगी। मेरे गुस्से और दुख के कारण आंसू बहने लगे , लगा कितनी अकेली हूं। मां पिताजी नहीं समझना चाहते मेरे मन की बात तो दूसरा कोई क्यों साथ देंगा । मैं गाड़ी से उतरकर अंधाधुंध आगे बढ़ी जा रही थी मुझे होश नहीं मैं कहां जा रही हूं। सामने से आटो आते देखा तो उसमें बैठ गई , पता नहीं उसको कहां जाने का पता दिया।जब आटो वाले ने मुझे उतारा तब एहसास हुआ मैं यश के फ्लेट के बाहर खड़ी हूं, मैं आंसुओं से भीगे चहरे और हारे हुए इंसान की तरह अंदर चली गई। इंसान समाज से लड़ सकता है , अपने आसपास वालों से लड़ सकता है लेकिन अपने घर वालों से कैसे लड़े।
मैं जब यश के कमरे में पहुंची तो देखा वह बिस्तर के कोने पर सिर पकड़े बैठा था। उसकी आंखों में मुझे अपना ही दुख गोते खाता दिखा, जैसे कितनी पीड़ा व वेदना में था वह । मुझे देखते ही उसने अपनी बाहें फैला दी और मैं उसके सीने से लग गई।हम दोनों एक दूसरे को कसकर ऐसे थामें रहे मानो किसी खाई में गिरने से अपने आप को बचा रहे थे।हम बिना बोले कितनी देर तक एक दूसरे को पकड़े बैठे रहे पता नहीं कब थोड़ी सी शराब पीकर एक दूसरे में समा गये पता नहीं।
अपने बारे में तो मुझे लगता है कि मेरी रुह बगावत की अंतिम चरण तक चली गई,जिन मां बाप की अब तक हर बात ,हर इच्छा आज्ञा की तरह शिरोधार्य की , उन्हें मेरे सपनों और प्रसन्नता की इतनी भी कद्र नहीं कि एक बार मेरी बात सुन ले।
मुझे ऐसा लग रहा था मैं किसी गहरी सुरंग में हूं और कोई मुझे पुकार रहा है , ऊपर की ओर खींच रहा है। लेकिन मैं बिल्कुल असहाय महसूस कर रही थी न आंखें खुल रही थी न सुरंग से निकल पा रही थी। बड़ी मुश्किल से जब आंख खोली तो देखा मीनल मुझे जोर जोर से हिला रही थी, उसकी आवाज बहुत दूर से आती प्रतित हो रही थी। एकदम से समझ नहीं आया कहां हूं मैं ,यह तो यश का कमरा लग रहा था। सिर इतनी ज़ोर से घूम रहा था चक्कर आ रहें थे , मैं सिर पकड़ कर बैठ गई और मीनल बोलती जा रही थी।
मीनल :" कल काकी जब होस्टल आईं तुझ से मिलने तो मैंने बता दिया तू कहां मिलेगी। रात जब तू नहीं आईं तो मैं ने सोचा तू काकी के साथ किसी होटल में ठहर गई होगी। सुबह काकी का फोन आया तो बहुत गुस्से में थी कह रही थी तुझे अच्छे से समझा दूं कि अपने रंग ढंग ठीक कर लें। मैं समझ गई तू उनके साथ नहीं है ,तब से दिमाग खराब हो गया कहां ढूंढूं तुझे। तूझे क्या लगता है अगर तूने कभी बताया नहीं तो मुझे समझ नहीं आयेगा तू यश से मिलती है । मैं सीधे यहीं आ गई अब बता क्या हुआ था।"
मैंने उसे जब सारी बात बता दी तो वह आश्चर्य से बोली :"यश कहां है ? " मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा था और चक्कर भी बंद नहीं हो रहें थे । मैं ने लापरवाही से कहा " यहीं कहीं होगा।"
मीनल :" नहीं मैं ने देखा है घर में कोई नहीं है , दरवाजा लॉक नहीं था बस चौकीदार बैठा है बाहर।यश की गाड़ी भी नहीं है , लगता है अपने दोस्त की तरह इसे भी नजरें चुराने और पीठ दिखाकर भागने की आदत है।"
मन बहुत खिन्न हो गया ऐसे कैसे बिना बोले गायब हो गया।अब एक पल भी रूकना कठिन हो रहा था , जल्दी से मुंह धोया ,पानी पीया और मीनल का सहारा लेकर होस्टल पहुंची। कल लंच के बाद से कुछ नहीं खाया था और रात को एक दो गिलास शराब पीली थी जबकि इससे पहले कभी पी नहीं थी ।इस समय उबकाई आ रही थी और बहुत बुरी हालत थी। उधर मीनल का बोलना बंद नहीं हो रहा था।
मीनल :" तू वहां गई क्यों ? यहां होस्टल आती तो क्या मैं तेरी बातें सुनती या समझती नहीं ।उस लंपट के पास चली गई, देखा क्या हश्र हुआ।"
मैं :" तू चुप कर बस , मेरी ग़लती है मैं कमजोर पड़ गई थी ,दूसरा तो फायदा उठाएंगा ही। स्वयं मैंने सब कुछ भुलाने के लिए इस रास्ते को चुना था इसलिए जो कुछ हुआ मेरी जिम्मेदारी है।"
मीनल :" तू उस लिच्चड की साईड क्यों ले रही है ,इतना प्यार करती है उससे और उसने एक मेसेज भी छोड़ना जरूरी नहीं समझा। "
मैं :" मैं उससे प्यार व्यार नहीं करती बस दोस्त मानती थी ।हमेशा पीछे खड़ा पाया तो सहारा ढुंढने चली गई। गलती मेरी हैं उसे पहचान नहीं सकीं।"
मीनल मुझे से बहस करती रही और हमारी जिंदगी में पहली बार जबरदस्त लड़ाई हुई। उसके बाद थक कर हम दोनों बहुत देर तक रोती रही। मीनल ने मुझे गले लगाते हुए कहा :" हर बात के लिए खुद को मत जिम्मेदार माना कर ,जब दूसरों से तकलीफ मिले तो उन्हें दोषी मानकर गुब्बार निकाल दिया कर ।चल तैयार होजा बाहर चलते हैं कुछ खाएंगे और पार्टी करेंगे।"
आज मीनल से दोस्ती और पक्की हो गई थी।
हम ने मान लिया अनिकेत और यश का अध्याय हमारी जिंदगी में यहीं समाप्त हो गया,एक कड़वी यादों मानकर हमने निश्चय किया कि सब कुछ भुला कर आगे बढ़ जाएंगे। हमारी कहानी भी यही समाप्त हो जाती, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
पन्द्रह बीस दिन बाद हम दोनों केंटीन में बैठें थे तभी अनिकेत आता दिखाई दिया ।मीनल ने मुंह दूसरी तरफ कर लिया लेकिन मैं नजरें नहीं हटा सकीं। वह बहुत कमजोर और दुखी लग रहा था,सच पूछो तो मुझे बिमार लग रहा था। मैं कुछ पूछती मीनल ने जोर से मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर बाहर ले गईं।दो दिन बाद ही होस्टल में कुछ लड़कियों से पता चला कि अनिकेत कक्षा में बेहोश हो कर गिर गया और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मीनल ने सुना तो उसके आंसू बहने लगे, मेरी तरफ़ बेबसी से देखते हुए बोली :" मुझे उसके पास जाना है, मैं ने तो उसको दिल से चाहा वह कद्र न कर सका तो क्या हुआ।"
हम दोनों अस्पताल पहुंचे ,वहां चार पांच लड़के लड़कियां झुंड बनाकर खड़े थे ,यश एक बेंच पर परेशान सा बैठा था। हमने उस झुंड के पास जाकर स्थिती की जानकारी लेना ज्यादा मुनासिब समझा।
पता चला डाक्टर जांच कर रहे हैं कुछ टेस्ट वगैरह भी हुएं हैं , अभी निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह सकते बात क्या है। थोड़ी देर बाद डाक्टर ने बताया , घबराने की कोई बात नहीं है , कुछ ज्यादा टेंशन और खाने पीने की लापरवाही के कारण यह सब हुआ है,दो दिन अस्पताल में रखकर ग्लुकोज़ चढ़ाकर छुट्टी कर देंगे। इतना सुनते ही वह झुंड तो खिसक लिया ,बस हम तीनों बैठे रह गए। मैं और मीनल एक बेंच पर बैठे हुए थे और यश सामने पड़ी बेंच पर , अनिकेत से मिलने की अभी इजाजत नहीं थी।
थोड़ी देर बाद यश मेरे पास आकर खड़ा हो गया तो मीनल कुछ दूर पर पड़ी कुर्सी पर जा कर बैठ गई।यश मेरे समीप बैठ गया , थोड़ी देर बाद बोला :" कैसी हो?"
मेरे दिल में अब उसके प्रति आक्रोश नहीं बचा था बस कुछ प्रश्न रह गए थे।इन दिनों यह बात समझ आ गईं थीं कि हृदय के किसी कोने में उसने स्थायी स्थान बना लिया था इसलिए स्वर में तल्खी लाएं बिना ही कहा :" ठीक हूं ?"
यश :" उस दिन बिना बताए एक जरूरी काम के कारण जाना पड़ा , समझाने का समय नहीं मिला ।एक दिन पहले लौटा तो देखा अनिकेत की तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। मैं तुमसे संपर्क नहीं कर सका मुझे माफ़ कर दो "
मैं :" कोई बात नहीं, लेकिन अनिकेत को क्या हुआ यह इतना स्ट्रेस क्यो फील कर रहा है कि डिप्रेशन में चला गया?"
यश :" हम सब भटके हुए हैं , राहें ढूंढ रहे हैं मंजिल निश्चित नहीं है, इसलिए गलतियां हो रही है । स्वयं भी दुखी हैं और औरों के दिल को भी ठेस पहुंचा रहे हैं | अपनी परेशानी वह स्वयं बताएगा तो अच्छा है मैं कैसे बता सकता हूं।"
मेरे मन से उसके प्रति जो बचाखुचा रोष था वह भी समाप्त हो गया ,हम सब स्वयं को समझने में लगे हुए हैं फिर एक दूसरे से इतनी अपेक्षाएं रखकर दूसरे का बोझ क्यों बढ़ा रहे हैं । सभी असमंजस की स्थिति में है। मैं ने मुस्कुराते हुए कहा :" उस दिन इतनी हताश हो गई थी जीवन से की सहारा ढुंढने तुम्हारे पास चली आई। तुम किसी भी तरह जिम्मेदार नहीं हो उस दिन जो हुआ उसके लिए और नहीं ही आगे किसी बंधन में बंधे हो मुझसे।"
यश बहुत भावुक हो गया, उसकी आवाज भी भारी हो गई। वह बोला :" तुम नहीं जानती उस दिन तुमने मुझ पर कितना बड़ा उपकार किया था। मैं निराशा के सागर में डूब रहा था अचानक तुम्हारा साथ मिलने से मैं उबर गया और फिर से जीने के लिए एक किरण मिल गई। मेरे डैड एक हिंस्क पशु है, अपने से कम उम्र की लड़कियों के साथ घूमने का उन्हें शौक है ।जब मेरी माम आपत्ति करती है तो इतना मारते हैं कि माम को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। मैं माम से हर बार कहता हूं कि वे डैड को छोड़ दें , पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दे लेकिन वे नहीं मानती है , उल्टा मुझे कसम खिलाकर चुप करा देती है। मैं थक गया था दहशत में जीतें हुए ,हर पल डर लगा रहता माम कैसी है। मैं ने घर के घुटन भरे माहौल से बचने के लिए यहां दूसरे शहर में दाखिला लिया , लेकिन मैं यहां होते हुए भी यहां नहीं होता था।मैं जिंदगी ठीक से नहीं जी पा रहा था।जब से तुमसे मिला तुम्हारी बहुत सी बातें मुझे आकर्षित करती थी । तुम्हारी लगन , जीवन को लेकर उत्साह , मैं भी तुम्हारे साथ जिंदगी जीना चाहता था,मगर यह हो नहीं पा रहा था। उस रात मेरे पास डाक्टर का फोन आया था, माम को अस्पताल लाया गया था । ऐसी स्थिति में वे बस मेरा नाम पुकारती है और मुझे याद करतीं हैं। मैं इतना थक गया था बार-बार वही स्थिति का सामना करते हुए कि उस समय मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी मैं गाड़ी चलाकर वहां जाऊं और माम को उस हाल में देखूं। मन कर रहा था डैड को गोली मार दूं जिनके कारण हम दोनों की जिंदगी नरक बनीं हुईं थीं या अपने आप को ही खत्म कर लूं। उस दिन तुम्हारी धड़कनों के साथ अपनी धड़कने सुनीं तो तुम्हारे साथ जीवन जीने की इच्छा जाग्रत होने लगी। जैसे ही माम ठीक होने लगी मैंने कड़े शब्दों में कह दिया कि अगर उन्हें मुझ से सम्बंध रखने है तो डैड से अलग होना पड़ेगा। डैड की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने को राज़ी नहीं है लेकिन अब अलग होने को तैयार हैं।
मैं :" तुम इतना सब इतनी कम उम्र में अकेले सहन करते रहे ,एक बार तो अपनी परेशानी मुझसे शेयर करते । और कुछ नहीं तो हाथ थाम कर तुम्हारा हौसला ही बढ़ाती , अकेलेपन का अहसास नहीं होने देती।"
यश :" डर लगता था कि तुम पता नहीं क्या सोचने लगोगी मेरे बारे में। तुम्हारे साथ जो समय बिताता था उससे मेरे दिमाग को स्थिरता मिलती थी, लगता था कहीं मेरी परेशानियों के बोझ से घबरा कर तुम मुझसे मिलना बिल्कुल बंद न कर दो।जब अनिकेत और मीनल का ब्रेकअप हुआ तो लगा मैं ने तुम्हें खो दिया।"
मैं :" चाहती तो थी तुमसे नफरत करूं ,न मिलु लेकिन तुम्हारे लिए मेरे दिल में एक खास स्थान है।" मैं ने शरमाते हुए अपना सिर झुका लिया।
उसने हौले से अपने हाथ से मेरा चेहरा उपर करते हुए मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा :" मेरी नौकरी लग गई है ,दो महीने बाद परीक्षा समाप्त होने पर मैं कलकत्ता चला जाऊंगा, अपनी माम को भी साथ ले जाऊंगा। मैं चाहता हूं हम दोनों शादी कर ले फिर तुम भी मेरे साथ चलो। अगर तुम चाहो तो मैं इंतजार कर सकता हूं लेकिन उस दिन तुम न जाने क्या बड़बड़ा रहीं थीं । मुझे लगता है तुम्हारे पिताजी तुम्हें आगे पढ़ने नहीं देंगे और तुम्हारी शादी भी तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कहीं भी कर देंगे। मुझसे शादी करके तुम्हें कोई बंदिश नहीं रहेगी , तुम जितना पढ़ना चाहो पढ़ लेना ,जो चाहे आगे कर लेना। मैं अपनी माम की भी मदद करूंगा जिससे वे आत्मविश्वास से जीवन व्यतीत कर सके।हम तीनों मिलकर एक दूसरे का साथ देंगे अपने व्यक्तित्व को निखारने में।"
मुझे लगा जैसे कोई सपना देख रहीं हूं। आंखों में आंसू थे , रुंधे गले से बोला नहीं जा रहा था, मैं बस ज़ोर ज़ोर से हांमी में सिर हिला रही थी।राह मिल गई थी , मंजिल भी मिल जाएंगी।
हम आपसी बातों में इतना मशगूल हो गए थे का पता ही नहीं चला मीनल कब अंदर चली गई थी अनिकेत से मिलने। जब हम दोनों अंदर पहुंचे तो देखा मीनल अनिकेत के कंधे पर सिर रखकर रो रही थी। मैं घबरा गई पता नहीं अब क्या हो गया। वैसे मीनल के लिए एक क्षण में रोना और दूसरे क्षण हंसना ऐसा है मानो कोई नल हो इधर घुमाया हंसना शुरू उधर घुमाया रोना शुरू। मुझे और यश को हैरान परेशान देखकर वह एकदम से बोली :" नहीं नहीं मैं खुशी के कारण रो रही हूं।"
मैं :" खुशी के कारण इतनी ज़ोर से कौन रोता है बस थोड़े से आंसू टपकते हैं।"
मीनल :" जितनी बड़ी खुशी उतने जोर से रोना-धोना।"
मैं :" अब बताएंगी ऐसी क्या खुशी मिल गई।"
मीनल :" अनिकेत ने मुझे प्रपोज किया है ,वह मुझसे प्यार करता है और शादी करना चाहता है।"
अनिकेत मेरी ओर देखते हुए बोला :"मैं जानता हूं तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा। मैं सचमुच मीनल को चाहने लगा हूं और यह अहसास मुझे चौदह फरवरी को हुआ। लेकिन मैं घबरा गया, मीनल से शादी का मतलब हर कदम पर विरोध और संघर्ष । उसके पिताजी अलग-अलग जातियों के कारण नहीं मानेंगे और मेरे डैड आर्थिक स्थिति के अंतर के कारण तैयार नहीं होंगे।वे मुझे जायदाद से भी बेदखल कर देंगे । मीनल से इतने दिन अलग रहकर समझ आया यह संघर्ष और पैसा कोई मायने नहीं रखता , मीनल में मेरी सांसें बसतीं है, उसके बिना मैं मृत समान हूं। मुझे समझ आ गया कि मीनल को साथ होगा तो मैं कोई भी मुश्किल का सामना कर लूंगा।"
मीनल पलंग से उतरकर उछलने और नाचने लगी ,वह जब बहुत खुश होती है तब ऐसा ही करतीं हैं। प्रसन्न तो मैं भी बहुत थी लेकिन मैं मुस्करा कर उसको देख रहीं थीं | अभी अपनी खुशी तो मैंने उसे बताईं नहीं वरना और जोर से पागलों की तरह उछलने लगती और सारा अस्पताल सिर पर उठा लेती। आज हम चारों बहुत खुश थे आगे परेशानी और संघर्ष तो बहुत रहेंगे लेकिन हम सफल अवश्य होंगे ,हम चारों प्रीत की अदभुत डोर से बंध गए थे।
लेखक - अज्ञात
**********************
Thanks for reading...
Tags: प्रेरणादायक हिंदी कहानी संग्रह, हिंदी कहानियां छोटे बच्चों के लिए, हिंदी कहानी बुक, हिंदी कहानी बच्चों की नई हिंदी कहानियां, हिंदी कहानी बच्चों की, हिंदी कहानी संग्रह, हिंदी कहानी बच्चों के लिए स्टोरी, मजेदार कहानियां हिंदी कार्टून, बच्चों की मजेदार हिंदी कहानियां, शार्ट स्टोरी फॉर चिल्ड्रन इन हिंदी, स्टोरी फॉर चिल्ड्रेन इन हिंदी, हिंदी स्टोरी फॉर चिल्ड्रन विथ मोरल, हिंदी स्टोरी फॉर किड्स, बच्चों के लिए हिंदी कहानियां, बच्चों की कहानियां हिंदी में, hindi kahaniyan full episode, hindi kahaniya baccho ke liye, hindi kahaniya baccho ki, hindi kahani for kids, hindi kahani books, hindi me kahani kaise likhe, hindi mein bachchon ki kahaniyan.
मेरे लिए मीनल को संभालना बहुत मुश्किल हो रहा था , तीन चार दिन हो गए थे ठीक से कुछ खा नहीं रही थी ,बस रोती रहती थी। अपने घर से दूर होस्टल में हम दोनों सहेलियां एक दूसरे की जिम्मेदारी थी। और एक दो दिन इसका बरताव ऐसा ही रहा तो मजबूरन मुझे इसके घर फोन करना पड़ेगा जो मैं करना नहीं चाहतीं थीं।

हम दोनों को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर वापिस जाना पड़ेगा। मैं उसको यही समझाने की कोशिश कर रही थी कि छोड़ जो हुआ, भूल जा ,अपने आप पर नियंत्रण रख और रोना-धोना बंद कर दें, लेकिन वह सुन नहीं रही थी । आखिर बार कोशिश करने के उद्देश्य से मैंने उसको झकझोरते हुए कहा" देख तुझे पहले से ही पता था वह कैसा लड़का है , फिर भी तूने उसके साथ दोस्ती की ।वह किसी भी लड़की के साथ लम्बे समय तक रिलेशनशिप में नहीं रहता है फिर तूने कैसे सोच लिया वह तेरे साथ सीरियस हो जाएगा।अब उसके लिएे रोने से क्या फायदा एक कटु अनुभव समझ कर आगे बढ़,जीवन में पता नहीं और क्या क्या देखने को मिलेगा।"
मीनल :" तू समझ नहीं रही है मैं उसे दिल से चाहने लगीं थीं। मेरे प्यार का इतना मान तो रखता कम से कम ब्रेकअप से पहले आकर इतना तो बताता क्यों मुझे एवाइड कर रहा है।बस एकदम से मिलना बंद कर दिया , फोन मिलाओ तो काट देता है और स्वयं मिलाता नहीं। पहले रोज मिलने आता था , व्यस्त होता था तो फोन करता था , लेकिन दस पंद्रह दिन से बिल्कुल अनदेखा कर रहा है। "
और मीनल ने फिर सुबकना शुरू कर दिया। अनिकेत को पता नही एकदम से ऐसा क्या हो गया मीनल से बिल्कुल संपर्क खत्म कर दिया , बिना किसी कारण के।एक हफ्ते तक मीनल सोचती रही शायद व्यस्त हैं लेकिन चार दिन पहले उसने अनिकेत को किसी लड़की के साथ देखा बस तब से उसने अपना यह हाल बना रखा था।
मैं :" अब अगर तूने अपने आप को नहीं संभाला तो मैं तेरे घर फोन करने वाली हूं कल को तूझे कुछ हो गया तो मेरी आफत आ जाएगी सोच ले तैयार हो जा ,हम दोनों बाहर चलते हैं , कुछ खाकर माल में घूम कर आएंगे। तुझे अच्छा लगेगा , नहीं तो मैं काकी को फोन कर रही हूं।"
मीनल आंखें पोंछ कर , "ठीक है चल मैं तैयार होकर आती हूं ।"
बेवकुफ ने सुबह से स्नान तक नहीं किया था , कपड़े लेकर वह बाथरूम में चली गई।
मीनल अनिकेत से चार महीने पहले ही मिली थी ,वह एमबीए फाइनल का छात्र था । मैं और मीनल अंग्रेजी में स्नातक के आखिरी वर्ष के छात्र थे । दोनों बिल्कुल अलग विभाग के थे, अलग-अलग इमारतों में कक्षा लगती थी, इसलिए हम कभी उससे मिले नहीं थे।इस बार युनिवर्सिटी ने भव्य रुप में दिपावली मनाने का कार्यक्रम रखा,सब विभागों को मिलजुल कर यह आयोजन करना था।
अनिकेत और उसके दोस्त दिवाली मेले का बंदोबस्त देख रहे थे और आखिरी वक्त पर मैंने दीये बेचने का स्टोल लगाने का मन बनाया।
बड़ी मिन्नतें करनी पड़ी अनिकेत की तब उसने एक छोटे-से स्टोल का इंतजाम किया किसी तरह , लेकिन उसे सजाने में बहुत मदद की। तीन दिन जब तक मेला रहा वह हमारे पास किसी न किसी बहाने से आता रहा।उसका यह व्यवहार हम दोनों की समझ से बाहर था,
वह केंपस का सबसे मशहूर लड़का था आकर्षक व्यक्तित्व और आत्मविश्वास से लबालब । वह और उसके दोस्त यश का नाम सुर्खियों में रहता था, कभी किसी प्रतियोगिता में अव्वल आने के लिए तो कभी किसी लड़की से फ्लर्ट या ब्रेकअप के लिए। होस्टल में रहने के कारण हमें यह सब सुनने को मिलता रहता था चुंकि होस्टल कामन था, एमबीए की बहुत सी लड़कियां थी।
अनिकेत के उपस्थिति के कारण हमारी बिक्री अच्छी हुई वरना हमें कौन पूछता। हमें तो कोई पलटकर भी देख लें तो हम पर एहसान करता था।
हम दोनों ही एक ऐसे छोटे से कस्बे से आईं थीं जहां पढ़ाई-लिखाई का विशेष महत्व नहीं था। लड़के गुंडा गर्दी में रहते और लड़कियों को पढ़ाने में कोई विश्वास नहीं करता था। मेरे परिवार में भाई दसवीं बारहवीं किसी तरह पढ़कर काम पर लग जाते, कईं कपड़ा मीले थी बस जो लड़का बड़ा होता वही काम करने लग जाता। मीनल के यहां खेत खलिहान थे गोदाम थे ,बस सारा खानदान इसी काम में लगे रहते।पान चबाते , मुंह में थूक की तरह गालियां भरे ,सब जगह अपनी धौंस जमाते फिरते।
मैं और मीनल अक्सर साथ रहते , उसके घर में बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थी और मैं अपने परिवार में इकलौती लड़की थी। हमें बाहर अकेले कहीं भी आने-जाने की इजाज़त नहीं थी। बारहवीं में हम दोनों के बहुत अच्छे अंक प्राप्त हुए , आजतक किसी के नहीं आए थे ।बस सब जगह वाह वाह होने लगी और पिताजी पर दबाव पड़ने लगा लड़की को और आगे पढ़ाया जाना चाहिए। यही हाल मीनल के घर का भी था। पिताजी का मन तो नहीं था लेकिन कुछ भावना में बह गए और कुछ समाज के संभ्रांत लोगों का दबाव ऐसा पड़ा की सबसे करीब शहर के कालेज में दोनों का दाखिला करवा दिया गया और रहने की व्यवस्था होस्टल में। लेकिन एक तलवार दोनों के सिर पर लटकी रहती कि कुछ भी उल्टी सीधी बात सुन ली दोनों के बारे में तो तुरंत वापस आना पड़ेगा।
एक साल तक हम दोनों भींगी बिल्ली बन कर रहे। मेरे दिमाग में एक उधेड़बुन सी रहती,अब तक औरतों का जीवन चुल्हे चौके तक सीमित मान कर चलती थी। कुछ फिल्मों में उनका दूसरा रूप देखकर सोचती यह सब काल्पनिक है या कुछ किस्तम वाली औरतें होंगी। लेकिन यहां होस्टल और कालेज में लड़कियां बिंदास कुछ भी पहनकर घूमती , बिना रोक-टोक जोर से हंसती बोलती तो बड़ा आश्चर्य होता। मुझे उससे अधिक प्रभावित उनकी सोच ने किया, सब के अलग-अलग सपने और उनके लिए कुछ भी कर गुजरने का जज्बा। मेरे भी अरमान कुलांचे भरने लगे,लगा मुझे भी अपने जीवन को कुछ अलग शक्ल देनी चाहिए।मीनल और मेरे बारहवीं में अंग्रेजी में सबसे अधिक अंक आए तो हमें लगा आगे अंग्रेजी ही पढ़नी चाहिए। लेकिन यहां आकर पता चला हमारी अंग्रेजी कितनी गई गुजरी थी , पता नहीं अंक कैसे आ गए | हमारा उच्चारण ,शब्द ज्ञान और व्याकरण सब निम्न स्तर के थे ।हम दोनों ने एक साल जमकर इस भाषा पर मेहनत की रात दिन एक कर दिये। अब हम दोनों के रहन-सहन , बोल चाल और विचारों में बहुत अंतर आ गया था,बहनजी से कूल बन गई थी। लेकिन लड़कों से बात करने में अभी भी फूंक सरकती थी |
मीनल और मैं जब भी समय मिलता ,शाम को हम अक्सर खाली होते बाहर निकल जाते।हम शहर का कोना कोना देखना चाहते थे, ऐसे ही घुमते हुए हम दोनों हस्तशिल्प की एक दुकान पर पहुंचे। वहां बहुत ही कलात्मक सुंदर और सादगी से भरी हाथ की बनी वस्तुएं रखी थी। मैं स्वयं इस तरह की वस्तुएं बनाकर बहुत आनंदित महसूस करतीं थीं ।उस दुकान की मालकिन प्रभादेवी ने मुझे बताया कैसे वह इस दुकान के माध्यम से गरीब लड़कियों की मदद करतीं हैं। पहले उन्हें सामान देकर काम सिखाती , बाद में जब लाभ होता वह उन्हें पैसे देकर उनकी आर्थिक मदद भी करती।वे बिल्कुल अकेली थी तो यह दुकान ही उनका जीवन थी।
लेकिन वे इस बात से दुखी थी की कोई इन वस्तुओं को अधिक खरीदना पसंद नहीं करता। मेरी दिलचस्पी देखकर वे बोलीं ," तुम जब चाहो यहां आकर सहायता कर सकती हो , रचनात्मक गतिविधियों में सम्मिलित होकर अपने अंदर की प्रतिभा को विकसित कर सकती हो।"
मैं अब जब भी फुर्सत मिलती वहां चली जाती, दुकान पर खड़े होकर लोगों को समान बेचना , बच्चों और महिलाओं के साथ बैठ कर हाथों से कुछ कलात्मक बनाना मुझे बहुत संतुष्टि देता। इन्हीं वस्तुओं को बेचने के लिएमुझे और मीनल को इस दिवाली मेले में अनिकेत से भाग लेने के लिए बहुत अनुरोध करना पड़ा था क्योंकि हमारे दिमाग में भाग लेने की बात बहुत देर से आईं। यह कालेज में हमारा आखिरी साल था इसलिए हम बहुत कुछ अनुभव कर लेना चाहती थी, फिर तो पता नहीं हमारे भाग्य में क्या लिखा है।
दिवाली की छुट्टियों में हम दोनों अपने घर चली गई। जब वापस आएं तो मैं यथावत हस्तशिल्प की दुकान जाने लगी शाम को और अनिकेत ने मीनल को काफी के लिए आमंत्रित किया।मीनल बहुत खुश हुई और वे अक्सर मिलने लगे, संध्या साथ बिताने लगे। मैं ने एक दो बार मना किया अनिकेत जैसे बदनाम लड़के से मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं। मीनल कहां मानने वाली थी, फिर कईं बार अनिकेत अपने दोस्त यश और मुझे भी साथ ले जाता लंच या डिनर , फिल्म या घूमने के लिए। मुझे इन दोनों दोस्तों के व्यवहार में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा और हम जब भी कहीं जाते चारों बहुत मस्ती करके आते। उन दोनों ने एक फ्लेट किराये पर ले रखा था
अपनी-अपनी गाडियां थी बहुत ठाठ-बाट से रहते थे। लगता था ,क्या सुना भी था बहुत पैसे वाले घर से हैं।यश की पता नहीं कोई स्थाई गर्लफ्रेंड थी की नहीं, हम जब भी साथ जाते वह किसी लड़की को साथ नहीं लाता था।
इस बार नये साल की पार्टी अनिकेत ने अपने फ्लेट पर रखीं थीं। हम दोनों को भी आमंत्रण मिला था , कुछ जुगाड करके वार्डन से इजाजत ली और पहुंच गए नए साल का जश्न मनाने। छत पर डीजे लगाकर संगीत का इंतजाम था , बहुत सारे लड़के लड़कियां आमंत्रित थे। तारों से भरा आसमान , ठंडी-ठंडी हवा और कर्णप्रिय संगीत सब मस्त हो रहे थे। अनिकेत और मीनल एक दूसरे में इतना खोए हुए थे उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं था,अधिकतर जो कपल्स थे उनका यही हाल था
जो अकेले थे वे भी अपनी धुन में नाच रहे थे। बीच-बीच में यश आता कुछ देर मेरे साथ नाचता फिर चला जाता । बहुत देर हो गई थी मुझे प्यास लगी थी कुछ खाने का मन भी कर रहा था खाने पीने का इंतजाम फ्लेट में था इसलिए मैं नीचे आ गई। यहां भी लड़के लड़कियां बिखरे पड़े थे , सोने का भी इंतजाम था इसलिए गद्दे भी पड़े थे। मैं ने प्लेट में मनपसंद चींजे डाली , एक कोक ली और बालकनी की ओर चल दी। बालकनी में यश हाथ में गिलास लिए अकेला खड़ा दूर शुन्य में न जाने क्या देख रहा था। मुझे पहले भी कई बार लगा था कि जैसे यश सबके मध्य होते हुए भी नहीं होता था ,न जाने कहां खोया हुआ होता था। जैसे ही मैं बालकनी में पहुंचीं वह पलटा ,एक पल को मुझे लगा उसकी आंखों में दर्द और अकेलापन था लेकिन तुरंत उसने मुस्कुराहट का मुखौटा ओढ़ लिया।
यश :" कुछ चाहिए क्या? "
मैं :" नहीं ,भूख लगी थी प्लेट लगा ली , तुम ने कुछ खाया या बस पीते रहने का इरादा है।"
यश :" जब सब खाएंगे तब कुछ ले लूंगा ।"
मैंने अपनी प्लेट आगे की तो उसने एक दो गस्सा खां लिया तभी एक पतली लम्बी सी लड़की आई और यश को खींचते हुए बोली :" चलो न यश बेबी डांस करने चलतें हैं "
वह उसके साथ चुपचाप चला गया। उसके बाद मेरा वहां मन नहीं लगा, कितनी भी भीड़ जमा कर लो मन का सूनापन कोई नहीं भर सकता ।बारह बजे सबने एक दूसरे को नये साल की शुभकामनाएं दी और फिर मैं एक कोने में गद्दे पर जाकर लेट गई।
एक दिन मैं हस्तशिल्प की दुकान पर अकेली बैठी कुछ मग पर चित्रकारी कर रही थी और प्यारे से संदेश लिख रही थी। किसी के आने की आहट पर मैंने आंखें उठा कर देखा तो यश खड़ा था । वह आश्चर्य से बोला :" तुम यहां क्या कर रही हो ?"
मैं :" कुछ नहीं तुम बताओ क्या चाहिए।?"
यश :" मेरी माम का जन्मदिन आने वाला है तो सोचा कोई तोहफा खरीद लेता हूं।"
मैं :" यहां यह सुगंधित मोमबत्ती आजकल बहुत पसंद की जा रही हैं ,मन को बहुत शांति देती है। फिर तुम कुछ मग भी दे सकते हो अपने आप कुछ लिख कर , उन्हें अपनेपन का अहसास होगा।"
यश ने बहुत सारी मोमबत्ती और कुछ मग लिए जिन पर उसने अपने हाथों से कुछ न कुछ लिखा।
उसे बहुत आनंद आया , लेकिन पौने आठ बज गए थे । आठ बजे के बाद होस्टल में घुसना मुश्किल हो जाएगा इसलिए मैंने उसे जल्दी करने को कहा। उसने मुझे अपनी गाड़ी में छोड़ा और अब अक्सर साढ़े सात बजे के करीब दुकान पर आ जाता मुझे समय से होस्टल छोड़ देता।
मुझे बहुत आराम हो गया था , इतनी ठंड में कभी रिक्शा मिलता था कभी नहीं , ज्यादा अंधेरा हो जाता था तो डर भी लगता था। इन दिनों मुझे उसकी आंखों में अपने लिए कुछ अलग भाव नजर आने लगे थे, लेकिन हम आपस में बहुत कम बोलते थे , खामोशी ही हमारी भाषा थी।
चौदह फरवरी को केंपस में उत्साह का ऐसा माहोल था कि सब पागल से हो रहे थे मीनल को अनिकेत ने गुलदस्ता, चाकलेट टेडीबियर और न जाने क्या क्या दिया।
मुझे तो एक दो ने जैसे कुछ रहम कर के कुछ फूल पकड़ा दिए वो भी मैं ने इधर उधर कर दिए। मुझे इस तरह की हरकतें बेवकुफी लगती थी। मीनल इतनी खुश थी कि पैर जमीन पर नहीं टिक रहें थे , लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि अगले दिन से अनिकेत ने उसे नजरअंदाज करना शुरू कर दिया।आठ दस दिन तो मीनल ने सोचा कुछ व्यस्त होगा , उसके फ्लेट में भी गई लेकिन या तो ताला लगा होता या कोई अंदर होता तो कह देता अनिकेत नहीं है। फोन भी नहीं उठा रहा था फिर एक दिन मीनल ने उसे मिस वेलेंटाइन के साथ देखा,बस उसी दिन से उसके रोने धोने का कार्यक्रम चल रहा था।
आधे घंटे बाद वह तैयार होकर आईं और हम होस्टल से बाहर निकल आए। सामने से यश आता दिखाई दिया , हमारे सामने आकर खड़ा हो गया, नजरें नहीं मिला रहा था। मीनल से बोला :" वो अनिकेत का पेनड्राइव दे दो" साफ दिख रहा था वह यहां बिल्कुल नहीं आना चाहता था , किसी अंधे कुएं में बैठना शायद उसके लिए बेहतर विकल्प होता। मीनल वापस चली गई अपने कमरे से अनिकेत का पेनड्राइव लाने और मैं ने यश को घूरना शुरू कर दिया। वह बहुत असहज महसूस कर रहा था ,हिले जा रहा था , इधर उधर देख रहा था। आखिर नहीं रहा गया तो बोला :" तू मुझे क्यो घूर रही हैं , मेरी क्या गलती है।"
मैंने अपने हाथ कमर पर रखकर लड़ने वाली मुद्रा बना ली और बोली :" तू एक कायर का दोस्त है बोल उस कुत्ते को आकर साफ साफ बताएं बात क्या है , ऐसे छिपने की क्या आवश्यकता है।"
और मैं गुस्से से उसे ऐसे ही देखती रही। उसने कंधे झटक दिया जैसे कह रहा हो घूर ले जितना घूरना है मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मीनल पेनड्राइव के साथ टेडीबियर और अनिकेत ने एक बड़ी महंगी ब्रांडेड घड़ी दी थी उसके जन्मदिन पर वह भी वापिस कर दी।
मीनल :" फूल मुरझा गए थे और चाकलेट मैं ने खा ली थी नहीं तो वे भी लौटा देती।" और हम दोनों अपने रास्ते चले गए।
अगले दिन पौने आठ बजे जब मैं हस्तशिल्प की दुकान से निकली तो यश बाहर गाड़ी में बैठा था। मैं उसे अनदेखा कर रिक्शे में बैठकर आगे बढ़ गई। वह गाड़ी धीरे धीरे चलाता मेरे पीछे होस्टल के गेट तक आया फिर चला गया। ऐसा कईं दिन तक चला ।एक दिन मौसम बहुत खराब हो गया , आंधी आ रहीं थीं , कोई रिक्शा नज़र नहीं आ रहा था स्ट्रीट लईट बंद थी घना अंधेरा था। मुझे कुछ घबराहट सी महसूस हुई तभी यश की गाड़ी मेरे एकदम पास आकर रुकी।
उसने बैठें बैठें ही मेरे लिए दरवाजा खोला और मैं चुपचाप बैठ गई ,इस समय अकड़ दिखाना भारी पड़ सकता था। कुछ देर हम खामोश बैठे रहे फिर यश बोला :" वे दोनों बच्चे नहीं हैं ,यह उनका व्यक्तिगत मामला है । उनके कारण हमारी दोस्ती पर क्यों आंच आ रही हैं। "
मैं :" शायद तुम ठीक कह रहे हो।"
इस बार प्रभा देवी ने होली के लिए आर्गेनिक रंग और गुलाल बनवाएं , वे चाहती थी कि इस बार किसी बड़े बाजार में इनकी बिक्री की जाएं। केंपस से थोड़ी दूरी पर शहर का सबसे बड़ा बाजार था वहां उन्होंने तीन दिन के लिए जगह किराये पर ली। पहले दिन तो मैं अधिक समय नहीं दे पाईं लेकिन अगले दिन मैं सुबह से ही पहुंच गईं। बहुत चहलकदमी और भीड़ थी बाजार में ,हमारा सामना भी खरीद रहे थे लोग । मुझे बहुत आनन्द और संतुष्टि मिल रही थी यह सब करके , मुझे लगा मेरे दिमाग में एक खाका सा तैयार हो रहा था कि भविष्य में मैं अपना जीवन किस तरह बिताना चाहती हूं। मैं आगे और पढ़ाई करके कोई नौकरी करूंगी , आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए, और कोई समाजसेवी संगठन या रचनात्मक कार्यशाला का हिस्सा बनुंगी मानसिक संतुष्टि के लिए। कहने को मार्च का महीना था अभी से गर्मी लगने लगी थी ,भीड़ भी बहुत थी इसलिए दमघुट रहा था। मैं अब स्कर्ट और शोर्ट्स में सहज महसूस करने लगी थी इसलिए शोर्ट्स पहन कर आई थी। जब गर्मी अधिक लगने लगी तो ऊपर पहनी हुई शर्ट उतार दी , उसके नीचे मैंने होल्टर नेक का टॉप पहना हुआ था । सात बजने वाले थे मैं ने सामान समेटना शुरू कर दिया ।इतनी कमाई देख प्रभा दीदी खुशी से झूम उठेंगी । कुछ हासिल करने का अहसास मुझे भी प्रसन्नता और संतुष्टि दे रहा था। तभी सामने से मां और चाचा को आते देखा, तो खुशी दुगनी हो गई की उनसे अपनी सफलता शेयर करुंगी। लेकिन मां का चेहरा मुझे देखते ही गुस्से से तमतमा गया , उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और खींचते हुए गाड़ी के पास ले गईं और धकेल कर उसमें बैठा दिया।
मां :" तेरा दिमाग खराब हो गया है , आधे अधूरे कपड़ों में बीच बाजार में सामान बेच रही है ,शर्म हया बेच खाई है।शरीर की नुमाइश कर रही है । तेरे पिताजी ने देख लिया होता तो एक मिनट यहां नहीं रुकने देते तुझे अब।"
मैं :" मां मेरी बात सुनो ,इन कपड़ों में कोई खराबी नहीं है। सब लड़कियां ऐसे ही कपड़े पहनती हैं। मां मैंने निश्चय कर लिया है मैं आगे क्या करूंगी , मेरे सपने क्या है...."
मां :" मुझे कुछ नहीं सुनना है तेरे पिताजी ने तेरा रिश्ता पक्का कर दिया , छगनलालजी के पोते गिरधारी से ।"
मैं :" नहीं मां मैं यह शादी नहीं करना चाहती हूं , मैं आगे पढ़ना चाहती हूं , अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं।"
मां ने एक जोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर मारा ।
मां :" दो चार महीने की पढ़ाई रह गई है नहीं तो अभी कान खींचते हुए तुझे घर ले जाती ।एक बात सुन ले जब वापस आएंगी तो यहां की बेशर्मी यहीं छोड़ कर आना । अजनबियों से हंसी ठिठोली और यह नंगापन वहां नहीं चलेगा।"
मुझे विश्वास नहीं हुआ कि मेरी मां मेरी बात ही सुनने को तैयार नहीं है वह मुझे मेरा भविष्य बनाने में क्या सहयोग देंगी। मेरे गुस्से और दुख के कारण आंसू बहने लगे , लगा कितनी अकेली हूं। मां पिताजी नहीं समझना चाहते मेरे मन की बात तो दूसरा कोई क्यों साथ देंगा । मैं गाड़ी से उतरकर अंधाधुंध आगे बढ़ी जा रही थी मुझे होश नहीं मैं कहां जा रही हूं। सामने से आटो आते देखा तो उसमें बैठ गई , पता नहीं उसको कहां जाने का पता दिया।जब आटो वाले ने मुझे उतारा तब एहसास हुआ मैं यश के फ्लेट के बाहर खड़ी हूं, मैं आंसुओं से भीगे चहरे और हारे हुए इंसान की तरह अंदर चली गई। इंसान समाज से लड़ सकता है , अपने आसपास वालों से लड़ सकता है लेकिन अपने घर वालों से कैसे लड़े।
मैं जब यश के कमरे में पहुंची तो देखा वह बिस्तर के कोने पर सिर पकड़े बैठा था। उसकी आंखों में मुझे अपना ही दुख गोते खाता दिखा, जैसे कितनी पीड़ा व वेदना में था वह । मुझे देखते ही उसने अपनी बाहें फैला दी और मैं उसके सीने से लग गई।हम दोनों एक दूसरे को कसकर ऐसे थामें रहे मानो किसी खाई में गिरने से अपने आप को बचा रहे थे।हम बिना बोले कितनी देर तक एक दूसरे को पकड़े बैठे रहे पता नहीं कब थोड़ी सी शराब पीकर एक दूसरे में समा गये पता नहीं।
अपने बारे में तो मुझे लगता है कि मेरी रुह बगावत की अंतिम चरण तक चली गई,जिन मां बाप की अब तक हर बात ,हर इच्छा आज्ञा की तरह शिरोधार्य की , उन्हें मेरे सपनों और प्रसन्नता की इतनी भी कद्र नहीं कि एक बार मेरी बात सुन ले।
मुझे ऐसा लग रहा था मैं किसी गहरी सुरंग में हूं और कोई मुझे पुकार रहा है , ऊपर की ओर खींच रहा है। लेकिन मैं बिल्कुल असहाय महसूस कर रही थी न आंखें खुल रही थी न सुरंग से निकल पा रही थी। बड़ी मुश्किल से जब आंख खोली तो देखा मीनल मुझे जोर जोर से हिला रही थी, उसकी आवाज बहुत दूर से आती प्रतित हो रही थी। एकदम से समझ नहीं आया कहां हूं मैं ,यह तो यश का कमरा लग रहा था। सिर इतनी ज़ोर से घूम रहा था चक्कर आ रहें थे , मैं सिर पकड़ कर बैठ गई और मीनल बोलती जा रही थी।
मीनल :" कल काकी जब होस्टल आईं तुझ से मिलने तो मैंने बता दिया तू कहां मिलेगी। रात जब तू नहीं आईं तो मैं ने सोचा तू काकी के साथ किसी होटल में ठहर गई होगी। सुबह काकी का फोन आया तो बहुत गुस्से में थी कह रही थी तुझे अच्छे से समझा दूं कि अपने रंग ढंग ठीक कर लें। मैं समझ गई तू उनके साथ नहीं है ,तब से दिमाग खराब हो गया कहां ढूंढूं तुझे। तूझे क्या लगता है अगर तूने कभी बताया नहीं तो मुझे समझ नहीं आयेगा तू यश से मिलती है । मैं सीधे यहीं आ गई अब बता क्या हुआ था।"
मैंने उसे जब सारी बात बता दी तो वह आश्चर्य से बोली :"यश कहां है ? " मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा था और चक्कर भी बंद नहीं हो रहें थे । मैं ने लापरवाही से कहा " यहीं कहीं होगा।"
मीनल :" नहीं मैं ने देखा है घर में कोई नहीं है , दरवाजा लॉक नहीं था बस चौकीदार बैठा है बाहर।यश की गाड़ी भी नहीं है , लगता है अपने दोस्त की तरह इसे भी नजरें चुराने और पीठ दिखाकर भागने की आदत है।"
मन बहुत खिन्न हो गया ऐसे कैसे बिना बोले गायब हो गया।अब एक पल भी रूकना कठिन हो रहा था , जल्दी से मुंह धोया ,पानी पीया और मीनल का सहारा लेकर होस्टल पहुंची। कल लंच के बाद से कुछ नहीं खाया था और रात को एक दो गिलास शराब पीली थी जबकि इससे पहले कभी पी नहीं थी ।इस समय उबकाई आ रही थी और बहुत बुरी हालत थी। उधर मीनल का बोलना बंद नहीं हो रहा था।
मीनल :" तू वहां गई क्यों ? यहां होस्टल आती तो क्या मैं तेरी बातें सुनती या समझती नहीं ।उस लंपट के पास चली गई, देखा क्या हश्र हुआ।"
मैं :" तू चुप कर बस , मेरी ग़लती है मैं कमजोर पड़ गई थी ,दूसरा तो फायदा उठाएंगा ही। स्वयं मैंने सब कुछ भुलाने के लिए इस रास्ते को चुना था इसलिए जो कुछ हुआ मेरी जिम्मेदारी है।"
मीनल :" तू उस लिच्चड की साईड क्यों ले रही है ,इतना प्यार करती है उससे और उसने एक मेसेज भी छोड़ना जरूरी नहीं समझा। "
मैं :" मैं उससे प्यार व्यार नहीं करती बस दोस्त मानती थी ।हमेशा पीछे खड़ा पाया तो सहारा ढुंढने चली गई। गलती मेरी हैं उसे पहचान नहीं सकीं।"
मीनल मुझे से बहस करती रही और हमारी जिंदगी में पहली बार जबरदस्त लड़ाई हुई। उसके बाद थक कर हम दोनों बहुत देर तक रोती रही। मीनल ने मुझे गले लगाते हुए कहा :" हर बात के लिए खुद को मत जिम्मेदार माना कर ,जब दूसरों से तकलीफ मिले तो उन्हें दोषी मानकर गुब्बार निकाल दिया कर ।चल तैयार होजा बाहर चलते हैं कुछ खाएंगे और पार्टी करेंगे।"
आज मीनल से दोस्ती और पक्की हो गई थी।
हम ने मान लिया अनिकेत और यश का अध्याय हमारी जिंदगी में यहीं समाप्त हो गया,एक कड़वी यादों मानकर हमने निश्चय किया कि सब कुछ भुला कर आगे बढ़ जाएंगे। हमारी कहानी भी यही समाप्त हो जाती, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
पन्द्रह बीस दिन बाद हम दोनों केंटीन में बैठें थे तभी अनिकेत आता दिखाई दिया ।मीनल ने मुंह दूसरी तरफ कर लिया लेकिन मैं नजरें नहीं हटा सकीं। वह बहुत कमजोर और दुखी लग रहा था,सच पूछो तो मुझे बिमार लग रहा था। मैं कुछ पूछती मीनल ने जोर से मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर बाहर ले गईं।दो दिन बाद ही होस्टल में कुछ लड़कियों से पता चला कि अनिकेत कक्षा में बेहोश हो कर गिर गया और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मीनल ने सुना तो उसके आंसू बहने लगे, मेरी तरफ़ बेबसी से देखते हुए बोली :" मुझे उसके पास जाना है, मैं ने तो उसको दिल से चाहा वह कद्र न कर सका तो क्या हुआ।"
हम दोनों अस्पताल पहुंचे ,वहां चार पांच लड़के लड़कियां झुंड बनाकर खड़े थे ,यश एक बेंच पर परेशान सा बैठा था। हमने उस झुंड के पास जाकर स्थिती की जानकारी लेना ज्यादा मुनासिब समझा।
पता चला डाक्टर जांच कर रहे हैं कुछ टेस्ट वगैरह भी हुएं हैं , अभी निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह सकते बात क्या है। थोड़ी देर बाद डाक्टर ने बताया , घबराने की कोई बात नहीं है , कुछ ज्यादा टेंशन और खाने पीने की लापरवाही के कारण यह सब हुआ है,दो दिन अस्पताल में रखकर ग्लुकोज़ चढ़ाकर छुट्टी कर देंगे। इतना सुनते ही वह झुंड तो खिसक लिया ,बस हम तीनों बैठे रह गए। मैं और मीनल एक बेंच पर बैठे हुए थे और यश सामने पड़ी बेंच पर , अनिकेत से मिलने की अभी इजाजत नहीं थी।
थोड़ी देर बाद यश मेरे पास आकर खड़ा हो गया तो मीनल कुछ दूर पर पड़ी कुर्सी पर जा कर बैठ गई।यश मेरे समीप बैठ गया , थोड़ी देर बाद बोला :" कैसी हो?"
मेरे दिल में अब उसके प्रति आक्रोश नहीं बचा था बस कुछ प्रश्न रह गए थे।इन दिनों यह बात समझ आ गईं थीं कि हृदय के किसी कोने में उसने स्थायी स्थान बना लिया था इसलिए स्वर में तल्खी लाएं बिना ही कहा :" ठीक हूं ?"
यश :" उस दिन बिना बताए एक जरूरी काम के कारण जाना पड़ा , समझाने का समय नहीं मिला ।एक दिन पहले लौटा तो देखा अनिकेत की तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। मैं तुमसे संपर्क नहीं कर सका मुझे माफ़ कर दो "
मैं :" कोई बात नहीं, लेकिन अनिकेत को क्या हुआ यह इतना स्ट्रेस क्यो फील कर रहा है कि डिप्रेशन में चला गया?"
यश :" हम सब भटके हुए हैं , राहें ढूंढ रहे हैं मंजिल निश्चित नहीं है, इसलिए गलतियां हो रही है । स्वयं भी दुखी हैं और औरों के दिल को भी ठेस पहुंचा रहे हैं | अपनी परेशानी वह स्वयं बताएगा तो अच्छा है मैं कैसे बता सकता हूं।"
मेरे मन से उसके प्रति जो बचाखुचा रोष था वह भी समाप्त हो गया ,हम सब स्वयं को समझने में लगे हुए हैं फिर एक दूसरे से इतनी अपेक्षाएं रखकर दूसरे का बोझ क्यों बढ़ा रहे हैं । सभी असमंजस की स्थिति में है। मैं ने मुस्कुराते हुए कहा :" उस दिन इतनी हताश हो गई थी जीवन से की सहारा ढुंढने तुम्हारे पास चली आई। तुम किसी भी तरह जिम्मेदार नहीं हो उस दिन जो हुआ उसके लिए और नहीं ही आगे किसी बंधन में बंधे हो मुझसे।"
यश बहुत भावुक हो गया, उसकी आवाज भी भारी हो गई। वह बोला :" तुम नहीं जानती उस दिन तुमने मुझ पर कितना बड़ा उपकार किया था। मैं निराशा के सागर में डूब रहा था अचानक तुम्हारा साथ मिलने से मैं उबर गया और फिर से जीने के लिए एक किरण मिल गई। मेरे डैड एक हिंस्क पशु है, अपने से कम उम्र की लड़कियों के साथ घूमने का उन्हें शौक है ।जब मेरी माम आपत्ति करती है तो इतना मारते हैं कि माम को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। मैं माम से हर बार कहता हूं कि वे डैड को छोड़ दें , पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दे लेकिन वे नहीं मानती है , उल्टा मुझे कसम खिलाकर चुप करा देती है। मैं थक गया था दहशत में जीतें हुए ,हर पल डर लगा रहता माम कैसी है। मैं ने घर के घुटन भरे माहौल से बचने के लिए यहां दूसरे शहर में दाखिला लिया , लेकिन मैं यहां होते हुए भी यहां नहीं होता था।मैं जिंदगी ठीक से नहीं जी पा रहा था।जब से तुमसे मिला तुम्हारी बहुत सी बातें मुझे आकर्षित करती थी । तुम्हारी लगन , जीवन को लेकर उत्साह , मैं भी तुम्हारे साथ जिंदगी जीना चाहता था,मगर यह हो नहीं पा रहा था। उस रात मेरे पास डाक्टर का फोन आया था, माम को अस्पताल लाया गया था । ऐसी स्थिति में वे बस मेरा नाम पुकारती है और मुझे याद करतीं हैं। मैं इतना थक गया था बार-बार वही स्थिति का सामना करते हुए कि उस समय मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी मैं गाड़ी चलाकर वहां जाऊं और माम को उस हाल में देखूं। मन कर रहा था डैड को गोली मार दूं जिनके कारण हम दोनों की जिंदगी नरक बनीं हुईं थीं या अपने आप को ही खत्म कर लूं। उस दिन तुम्हारी धड़कनों के साथ अपनी धड़कने सुनीं तो तुम्हारे साथ जीवन जीने की इच्छा जाग्रत होने लगी। जैसे ही माम ठीक होने लगी मैंने कड़े शब्दों में कह दिया कि अगर उन्हें मुझ से सम्बंध रखने है तो डैड से अलग होना पड़ेगा। डैड की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने को राज़ी नहीं है लेकिन अब अलग होने को तैयार हैं।
मैं :" तुम इतना सब इतनी कम उम्र में अकेले सहन करते रहे ,एक बार तो अपनी परेशानी मुझसे शेयर करते । और कुछ नहीं तो हाथ थाम कर तुम्हारा हौसला ही बढ़ाती , अकेलेपन का अहसास नहीं होने देती।"
यश :" डर लगता था कि तुम पता नहीं क्या सोचने लगोगी मेरे बारे में। तुम्हारे साथ जो समय बिताता था उससे मेरे दिमाग को स्थिरता मिलती थी, लगता था कहीं मेरी परेशानियों के बोझ से घबरा कर तुम मुझसे मिलना बिल्कुल बंद न कर दो।जब अनिकेत और मीनल का ब्रेकअप हुआ तो लगा मैं ने तुम्हें खो दिया।"
मैं :" चाहती तो थी तुमसे नफरत करूं ,न मिलु लेकिन तुम्हारे लिए मेरे दिल में एक खास स्थान है।" मैं ने शरमाते हुए अपना सिर झुका लिया।
उसने हौले से अपने हाथ से मेरा चेहरा उपर करते हुए मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा :" मेरी नौकरी लग गई है ,दो महीने बाद परीक्षा समाप्त होने पर मैं कलकत्ता चला जाऊंगा, अपनी माम को भी साथ ले जाऊंगा। मैं चाहता हूं हम दोनों शादी कर ले फिर तुम भी मेरे साथ चलो। अगर तुम चाहो तो मैं इंतजार कर सकता हूं लेकिन उस दिन तुम न जाने क्या बड़बड़ा रहीं थीं । मुझे लगता है तुम्हारे पिताजी तुम्हें आगे पढ़ने नहीं देंगे और तुम्हारी शादी भी तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कहीं भी कर देंगे। मुझसे शादी करके तुम्हें कोई बंदिश नहीं रहेगी , तुम जितना पढ़ना चाहो पढ़ लेना ,जो चाहे आगे कर लेना। मैं अपनी माम की भी मदद करूंगा जिससे वे आत्मविश्वास से जीवन व्यतीत कर सके।हम तीनों मिलकर एक दूसरे का साथ देंगे अपने व्यक्तित्व को निखारने में।"
मुझे लगा जैसे कोई सपना देख रहीं हूं। आंखों में आंसू थे , रुंधे गले से बोला नहीं जा रहा था, मैं बस ज़ोर ज़ोर से हांमी में सिर हिला रही थी।राह मिल गई थी , मंजिल भी मिल जाएंगी।
हम आपसी बातों में इतना मशगूल हो गए थे का पता ही नहीं चला मीनल कब अंदर चली गई थी अनिकेत से मिलने। जब हम दोनों अंदर पहुंचे तो देखा मीनल अनिकेत के कंधे पर सिर रखकर रो रही थी। मैं घबरा गई पता नहीं अब क्या हो गया। वैसे मीनल के लिए एक क्षण में रोना और दूसरे क्षण हंसना ऐसा है मानो कोई नल हो इधर घुमाया हंसना शुरू उधर घुमाया रोना शुरू। मुझे और यश को हैरान परेशान देखकर वह एकदम से बोली :" नहीं नहीं मैं खुशी के कारण रो रही हूं।"
मैं :" खुशी के कारण इतनी ज़ोर से कौन रोता है बस थोड़े से आंसू टपकते हैं।"
मीनल :" जितनी बड़ी खुशी उतने जोर से रोना-धोना।"
मैं :" अब बताएंगी ऐसी क्या खुशी मिल गई।"
मीनल :" अनिकेत ने मुझे प्रपोज किया है ,वह मुझसे प्यार करता है और शादी करना चाहता है।"
अनिकेत मेरी ओर देखते हुए बोला :"मैं जानता हूं तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा। मैं सचमुच मीनल को चाहने लगा हूं और यह अहसास मुझे चौदह फरवरी को हुआ। लेकिन मैं घबरा गया, मीनल से शादी का मतलब हर कदम पर विरोध और संघर्ष । उसके पिताजी अलग-अलग जातियों के कारण नहीं मानेंगे और मेरे डैड आर्थिक स्थिति के अंतर के कारण तैयार नहीं होंगे।वे मुझे जायदाद से भी बेदखल कर देंगे । मीनल से इतने दिन अलग रहकर समझ आया यह संघर्ष और पैसा कोई मायने नहीं रखता , मीनल में मेरी सांसें बसतीं है, उसके बिना मैं मृत समान हूं। मुझे समझ आ गया कि मीनल को साथ होगा तो मैं कोई भी मुश्किल का सामना कर लूंगा।"
मीनल पलंग से उतरकर उछलने और नाचने लगी ,वह जब बहुत खुश होती है तब ऐसा ही करतीं हैं। प्रसन्न तो मैं भी बहुत थी लेकिन मैं मुस्करा कर उसको देख रहीं थीं | अभी अपनी खुशी तो मैंने उसे बताईं नहीं वरना और जोर से पागलों की तरह उछलने लगती और सारा अस्पताल सिर पर उठा लेती। आज हम चारों बहुत खुश थे आगे परेशानी और संघर्ष तो बहुत रहेंगे लेकिन हम सफल अवश्य होंगे ,हम चारों प्रीत की अदभुत डोर से बंध गए थे।
लेखक - अज्ञात
**********************
Thanks for reading...
Tags: प्रेरणादायक हिंदी कहानी संग्रह, हिंदी कहानियां छोटे बच्चों के लिए, हिंदी कहानी बुक, हिंदी कहानी बच्चों की नई हिंदी कहानियां, हिंदी कहानी बच्चों की, हिंदी कहानी संग्रह, हिंदी कहानी बच्चों के लिए स्टोरी, मजेदार कहानियां हिंदी कार्टून, बच्चों की मजेदार हिंदी कहानियां, शार्ट स्टोरी फॉर चिल्ड्रन इन हिंदी, स्टोरी फॉर चिल्ड्रेन इन हिंदी, हिंदी स्टोरी फॉर चिल्ड्रन विथ मोरल, हिंदी स्टोरी फॉर किड्स, बच्चों के लिए हिंदी कहानियां, बच्चों की कहानियां हिंदी में, hindi kahaniyan full episode, hindi kahaniya baccho ke liye, hindi kahaniya baccho ki, hindi kahani for kids, hindi kahani books, hindi me kahani kaise likhe, hindi mein bachchon ki kahaniyan.
आपके लिए कुछ विशेष लेख
- इंडियन गांव लड़कियों के नंबर की लिस्ट - Ganv ki ladkiyon ke whatsapp mobile number
- रण्डी का मोबाइल व्हाट्सअप्प कांटेक्ट नंबर - Randi ka mobile whatsapp number
- सेक्स करने के लिए लड़की चाहिए - Sex karne ke liye sunder ladki chahiye
- किन्नर व्हाट्सप्प मोबाइल नंबर फोन चाहिए - Kinner whatsapp mobile phone number
- अनाथ मुली विवाह संस्था फोन नंबर चाहिए - Anath aashram ka mobile number
- नई रिलीज होने वाली फिल्मों की जानकारी और ट्रेलर, new bollywood movie trailer 2018
- गन्ने की खेती वैज्ञानिक तरीके से कैसे करे Ganne ki Kheti vaigyanik tarike se kaise karen
- Ghar Jamai rishta contact number - घर जमाई लड़का चाहिए
- लड़की महिला औरत को गर्म कैसे करें - Ladki ko garam karne ka tarika in hindi
- मैं अकेली हूँ, मुझे अभी फोन करो - क्या अकेले हैं आप? Please call me
एक टिप्पणी भेजें
प्रिय दोस्त, आपने हमारा पोस्ट पढ़ा इसके लिए हम आपका धन्यवाद करते है. आपको हमारा यह पोस्ट कैसा लगा और आप क्या नया चाहते है इस बारे में कमेंट करके जरुर बताएं. कमेंट बॉक्स में अपने विचार लिखें और Publish बटन को दबाएँ.